आइये जानते है हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मणिकर्ण बारे में

मणिकर्ण – मणिकर्ण अपने गर्म पानी के चश्मों के लिए भी प्रसिद्ध है। देश-विदेश के लाखों प्रकृति प्रेमी पर्यटक यहाँ बार-बार आते है, विशेष रुप से ऐसे पर्यटक जो चर्म रोग या गठिया जैसे रोगों से परेशान हों यहां आकर स्वास्थ्य सुख पाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि यहां उपलब्ध गंधकयुक्त गर्म पानी में कुछ दिन स्नान करने से ये बीमारियां ठीक हो जाती हैं। खौलते पानी के चश्मे मणिकर्ण का सबसे अचरज भरा और विशिष्ट आकर्षण हैं

चावल पकाए जाते हैं – चावल को बरतन में रख कर यहां पर रख दिया जाता है तो कुछ ही मिनट में चावल पक जाते हैं। यहां का पानी इतना गर्म होता है कि कोई भी इसमें हाथ तक नहीं डाल सकता। इस स्रोत के जल को पार्वती नदी के पानी में मिला कर नहाने के लायक बनाया जाता है।manikaran shiva temple

हिंदू मान्यता – यहां का नाम इस घाटी में शिव के साथ विहार के दौरान पार्वती के कान [कर्ण] की बाली [मणि] खो जाने के कारण पड़ा। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव की पत्नी पार्वती ने अपना बहुमूल्य रत्न यहाँ के किसी जलाशय में खो दिया दिया। माँ पार्वती के निवेदन पर भगवान शिव ने अपने अनुयायीयों को रत्न खोजने के लिए कहा। लेकिन शिव के सेवक इस कार्य में सफल नहीं हो सके। तब भगवान शिव ने क्रोध में अपना तृतीय नेत्र खोला, जिसके कारण धरती में दरार पड़ गई और बहुमूल्य रत्नों और जवाहरातों का सृजन हुआ।

मणिकर्ण सिखों के धार्मिक स्थल – Gurudwara Sahib Manikaranगुरुद्वारा मणिकर्ण साहिब गुरु नानकदेव की यहां की यात्रा की स्मृति में बना था। जनम सखी और ज्ञानी ज्ञान सिंह द्वारा लिखी तवारीख गुरु खालसा में इस बात का उल्लेख है कि गुरु नानक ने भाई मरदाना और पंज प्यारों के साथ यहां की यात्रा की थी। इसीलिए पंजाब से बड़ी संख्या में लोग यहां आते हैं। पूरे साल यहां दोनों वक्त लंगर चलता रहता है।

कैसे जाएं – समुद्र तल से 1760 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मणिकर्ण कुल्लू से 45 किलोमीटर दूर है। भुंतर तक राष्ट्रीय राजमार्ग है| भुंतर में छोटे विमानों के लिए हवाई अड्डा भी है।

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