आइये जानते है हिमाचल के जिला कांगड़ा ओर उसके आस पास के पर्यटन स्थ्लों के बारे में

कांगड़ा हिमाचल की सबसे खूबसूरत घाटियों में एक है। धौलाधर पर्वत श्रंखला से आच्छादित यह घाटी इतिहास और संस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखती है। एक जमाने में यह शहर चंद्र वंश की राजधानी थी। कांगड़ा का उल्लेख 3500 साल पहले वैदिक युग में मिलता है। पुराण, महाभारत और राजतरंगिणी में इस स्थान का जिक्र किया गया है। त्रिगर्त के नाम से प्रसिद्ध कांगड़ा हिमाचल प्रदेश की प्राचीनतम रियासत है। महाभारत काल में इसकी स्थापना सुशर्मा ने की थी। कांगड़ा को ‘त्रिगर्त’ के अलावा ‘नगरकोट’ के नाम से भी जाना जाता है। प्रचीनकाल में यह कटोच राजाओं का केंद्र रहा। ग्यारवीं शताब्दी में हिंदू शाही वंश के शासक जयपाल की पूर्वी सीमा कांगड़ा था। 1399 में तैमूर ने कांगड़ा पर आक्रमण किया था। जहांगीर के समय 1620 ई. में कांगड़ा को मुगल साम्राज्य में जिला मिला लिया गया। उसके पश्चात कांगड़ा की स्थानीय राजपूत शैली और मुगल शैली से मिश्रित चित्रकारी की शैली विकसित हुई। 1785 ई. के पश्चात संसारचंद व रणजीत सिंह का भी कांगड़ा पर अधिकार रहा। 1966 के पंजाब पुनर्गठन के फलस्वरूप कांगड़ा को हिमाचल प्रदेश को सौंप दिया गया। पहली सितंबर, 1972 को कांगड़ा जिला के तीन भाग कर ऊना, हमीरपुर, कांगड़ा जिलों का निर्माण किया गया।

आइये जानते है हिमाचल के जिला कांगड़ा के आस पास के पर्यटन स्थ्लों के बारे में – 

कांगड़ा देवी मंदिर- बृजेश्वरी देवी मंदिर व कांगड़ा देवी मंदिर नगर कोट, कांगड़ा जिले, हिमाचल प्रदेश में स्थित है। माता बृजेश्वरी देवी मंदिरर को नगर कोट की देवी व कांगड़ा देवी के नाम से भी जाना जाता है और इसलिए इस मंदिर को नगर कोट धाम भी कहा जाता है। मां के शक्तिपीठों में से एक मां ब्रजरेश्वरी देवी के धाम के बारे मे कहते हैं कि जब मां सती ने पिता के द्वारा किए गए शिव के अपमान से कुपित होकर अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे, तब क्रोधित शिव उनकी देह को लेकर पूरी सृष्टि में घूमे. शिव का क्रोध शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए. शरीर के यह टुकड़े धरती पर जहां-जहां गिरे वह स्थान शक्तिपीठ कहलाया. मान्यता है कि यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था इसलिए ब्रजरेश्वरी शक्तिपीठ में मां के वक्ष की पूजा होती है

ज्वालामुखी देवी मंदिर- हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर स्तिथ है ज्वालामुखी देवी। ज्वालामुखी मंदिर को जोता वाली का मंदिर भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार ज्वाला देवी में सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। मान्यता है कि सभी शक्तिपीठों में देवी भगवान् शिव के साथ हमेशा निवास करती हैं। शक्तिपीठ में माता की आराधना करने से माता जल्दी प्रसन्न होती है।

चामुण्ड़ा देवी मंदिर- चामुंडा देवी मंदिर कांगड़ा ज़िला, हिमाचल प्रदेश के शानदार हिल स्टेशन पालमपुर में स्थित है। इस मंदिर को देवी के शक्तिपीठों में गिना जाता है। बानेर नदी के तट पर बसा यह मंदिर महाकाली को समर्पित है। चण्ड और मुण्ड नामक दो असुरो को भेजा और कहा कि उसके केश पकड़कर हमारे पास ले आओ। चण्ड और मुण्ड देवी कोशिकी के पास गये और उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। देवी के मना करने पर उन्होंने देवी पर प्रहार किया। तब देवी ने अपना काली रूप धारण कर लिया और असुरो को यमलोक पहुंचा दिया। उन दोनो असुरो को मारने के कारण माता का नाम चामुण्डा पड गया।

बगलमुखी मंदिर कांगड़ा- कांगड़ा के बगलामुखी मंदिर का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। बगलमुखी मंदिर कांगड़ा जिले के एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। कई भक्त यहाँ हर रोज हिंदू देवी बगलमुखी की पूजा करने आते हैं, जिन्हें हिंदू पौराणिक कथाओं में दस बुद्धि की देवी में एक माना जाता है। धर्मशाला-कांगड़ा-चंडीगढ़ राजमार्ग की सड़क पर स्थित यह मंदिर कांगड़ा में कोटला किले के द्वार पर स्थित है।

कांगड़ा किला – कांगड़ा के शासकों की निशानी यह किला भूमा चंद ने बनवाया था। वाणगंगा नदी के किनार बना यह किला 350 फीट ऊंचा है। इस किले पर अनेक हमले हुए हैं। सबसे पहले कश्मीर के राजा श्रेष्ठ ने 470 ई. में इस पर हमला किया।

बैजनाथ शिव मंदिर, पालमपुर- बैजनाथ शिव मंदिर हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा ज़िले में शानदार पहाड़ी स्थल पालमपुर में स्थित है। बैजनाथ १३वीं शताब्दी के बने शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. बैजनाथ शिव मंदिर पठानकोट-मंडी नेशनल हाईवे के बिलकुल बगल में स्थित है. यह ऐतिहासक शिव मंदिर प्राचीन शिल्प एवं वास्तुकला का अनूठा व बेजोड़ नमूना है

धर्मशाला- जिला कांगड़ा के मुख्यालय धर्मशाला से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मैक्लोडगंज है। तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा की मौजूदगी से यह स्थान विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। इसी स्थान पर निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय भी है। इसके साथ ही मिनी इजरायल के नाम से विख्यात धर्मकोट, भागसूनाग व नड्डी भी बेहतरीन पर्यटन स्थल हैं। यहां से 10 किलोमीटर की पैदल दूरी पर त्रियुंड नामक स्थान है, जो ट्रेकिंग के शौकीन पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यहां हर हजारों पर्यटक पहुंचते हैं।

मशरूर मंदिर- कांगड़ा के दक्षिण से 15 किमी. दूर स्थित मशरूर नगर समुद्र तल से 800 मीटर की ऊंचाई पर है। इस नगर में 15 शिखर मंदिर है। चट्टानों को काटकर बनाए गए इन मंदिरों का संबंध दसवीं शताब्दी से है। यह मंदिर इंडो-आर्यन शैली में बना हुआ हैं। इन मंदिरों की तुलना अजंता और एलौरा के मंदिरों से की जाती है।

चिन्मय तपोवन- कांगड़ा से 10 किमी. दूर चिन्मय तपोवन एक पहाड़ी पर स्थित है। इस आश्रम परिसर की स्थापना हाल ही में गीता के व्याख्याता स्वामी चिन्मयानंद ने की थी। इस खूबसूरत स्थान पर हनुमान की एक विशाल मूर्ति स्थापित है। साथ की एक विशाल शिवलिंग भी यहां दूर से देखा जा सकता है।

कोटला किला – शाहपुर और नूरपुर के बीच राजमार्ग पर कांगड़ा के पास स्थित प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में से एक है। इस किला आगंतुकों के लिए आसपास का एक शानदार दृश्य प्रदान करता है क्योंकि यह एक अलग चोटी पर बसा सुंदर घाटियों से घिरा हुआ है।

कैसे पहुंचे कांगड़ा घाटी – कांगड़ा घाटी के मुख्यालय धर्मशाला तक आने के लिए दिल्ली, पठानकोट व चंडीगढ़ से सीधी बस सेवा उपलब्ध है। इसके अलावा यह घाटी पठानकोट-जोगेंद्रनगर नैरोगेज रेलमार्ग से भी जुड़ी हुई है। इस छोटी ट्रेन का भी पर्यटक आनंद उठा सकते है। यहां का ब्राडगेज रेलमार्ग का नजदीकी स्टेशन पठानकोट है। जबकि हवाई सेवा के लिए धर्मशाला से महज 14 किमी की दूरी पर गगल में एयरपोर्ट स्थित है। यहां से दिल्ली के लिए रोजाना दो हवाई उड़ाने हैं।

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