माता शिकारी देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश

शिकारी माता का यह मंदिर करसोग , जनजेलही घाटी में एक उच्चे शिखर पर 11000 फ़ीट की उचाई में स्थित है. मगर सबसे हैरत वाली बात ये कि मंदिर पर छत नहीं लग पाई। कहा जाता है कि कई बार मंदिर पर छत लगवाने काम शुरू किया गया। लेकिन हर बार कोशिश नाकाम रही। यह माता का चमत्कार है कि आज तक की गई सारी कोशिशें भी शिकारी माता को छत प्रदान न कर सकी |

माता शिकारी देवी नाम कैसे पडा – कहा जाता है कि जब पांडवो और कौरवो के बीच में जुए का खेल चल रहा था तब एक औरत ने उनको मना किया उसको खेलने से पर होनी को टाला नही जा सका और जुआ खेलने के फलस्वरूप पांडवो को अपना महल और राजपाट छोडकर निर्वासित होना पडा । जब पांडव अपना वनवास काट रहे तो वो इस क्षेत्र में आये और कुछ समय यहां पर रहे । एक दिन अर्जुन एवं अन्य भाईयो ने एक सुंदर मृग देखा तो उन्होने उसका शिकार करना चाहा पर वो मृग काफी पीछा करने के बाद भी उनके हाथ नही आया ।jai mata di

सारे पांडव उस मृग की चर्चा करने लगे कि वो मृग कहीं मायावी तो नही था कि तभी आकाशवाणी हुई कि मै इस पर्वत पर वास करने वाली शक्ति हूं और मैने पहले भी तुम्हे जुआ खेलते समय सावधान किया था पर तुम नही माने और इसीलिये आज वनवास भोग रहे हो ।

इस पर पांडवो ने उनसे क्षमा प्रार्थना की तो देवी ने उन्हे बताया कि मै इसी पर्वत पर नवदुर्गा के रूप में विराजमान हूं और यदि तुम मेरी प्रतिमा को निकालकर उसकी स्थापना करोगे तो तुम अपना राज्य पुन पा जाओगे । पांडवो ने ऐसा ही किया और उन्हे नवदुर्गा की प्रतिमा मिली जिसे पांडवो ने पूरे विधि विधान से स्थापित किया । चूंकि माता मायावी मृग के शिकार के रूप में मिली थी इसलिये माता का नाम शिकारी देवी कहा गयाShikari Devi temple

नाम के पीछे एक ओर मान्यता –जिस जगह पर यह मंदिर है, वह बहुत घने जंगल के मध्य ने स्थित है. अत्यधिक जंगल होने के कारण यहाँ जंगली जीव-जन्तु भी बहुतयात में हैं |

पुराने जमाने में लोग शिकार करने के लिए इस घने जंगल में आया करते थे और पहाड़ की चोटी पर जहाँ माता का मंदिर है, वहीँ से जंगल में शिकार का जायजा लेते थे | कभी-२ मन्दिर में जाकर माँ को प्रणाम करते और आग्रह करते कि आज कोई अच्छा शिकार हाथ लगे, कई बार शिकारियों की मुराद भी पूरी हो जाती थी, तब तक यहाँ का नाम शिकारी नहीं था |

लोग अक्सर शिकार की तलाश में आते रहते थे, तो यह स्थान शिकारगाह में ही तब्दील हो गया, शिकार वाला जंगल होने के कारण, लोगों ने इसे शिकारी कहना शुरू कर दिया. धीरे-2 यहाँ स्थापित दुर्गा माँ भी शिकारी माता के नाम से जानी जाने लगी और प्रसिद्ध हो गई |

शिकारी माता मंदिर का इतिहास – मार्कण्डेय ऋषि ने मंदिर वाली जगह पर वर्षो तक माँ दुर्गा की तपश्या करी तथा माँ दुर्गा ने उनके तप से शिकारी माताप्रसन्न होकर उन्हें शक्ति के रूप में दर्शन दिया व यहा स्थापित हुई| इसके बाद पांडव अपने अज्ञातवास के समय यहा आये थे तथा उन्होंने शक्ति रूप में विध्यमान माता की तपश्या करी जिस से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें महाभारत के युद्ध में कौरवो से विजयी प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया. पांडव ने यहा से जाते वक्त माँ के मंदिर का निर्माण किया परन्तु यह कोई भी जानता की आखिर इस मंदिर के छत का निर्माण पांडवो द्वारा क्यों नही किया गया.

शिकारी माता मंदिर आने का समय- शिकारी देवी मंदिर आने का सबसे अच्छा समय गर्मियों का मौसम है

शिकारी माता मंदिर प्रमुख शहरों से मंदिर की दूरी

  1. मंडी-80KM
  2. कुल्लू -155KM
  3. मनाली-200KM
  4. शिमला-180KM
  5. धर्मशाला-240KM
  6. चंडीगढ़ -300KM

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