टौणी देवी मंदिर हमीरपुर हिमाचल

टौणीदेवी माता राष्ट्रीय उच्चमार्ग-70 पर है। हमीरपुर से मंडी रोड़ पर करीब 14 किलोमीटर का सफर तय करने पर माता के मंदिर में पहुंच सकते हैं। देवी चौहान वंश की कुलदेवी है। क्षेत्र के चौहान वंश के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब व हिमाचल के विभिन्न स्थानों के लोग यहां कुलदेवी को मनाने के लिए हर वर्ष आते हैं।humhimachali toni devi

मंदिर का इतिहास – कहा जाता है कि आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व जब दिल्ली पर मुगलों का आधिपत्य हो गया, तो उन्होंने राजपूतों की मां-बहनों पर अत्याचार व व्यविचार करना प्रारंभ कर दिया और राजपूतों को जनेऊ उतारने कर धर्म परिवर्तन करवाने लगे, तो चौहान वंश के बारह भाइयों ने इन पहाड़ी दुर्गम क्षेत्र में शरण ली थी, ताकि अपने धर्म व परिजनों की रक्षा कर सकें।

यहां पर शरण लेने के उपरांत दिन के समय पुंग खड्ड में छुप जाते थे, जबकि रात के समय सभी टौणीदेवी में एक गुफा में रहते थे। इनमें सात भाई भी अपने परिवार सहित आ पहुंचे थे। इनकी इकलौती बहन थी, जिसे सुनाई नहीं देता था। सभी भाभियां इस देवी को खूब सताती थीं। दिन के समय सभी भाई कहीं बाहर गए थे और भाभियों ने ननद को खूब खरी-खोटी सुनाई, दुखी होकर वह लड़की धरती में समा गई। जब भाई घर पहुंचे, तो देखा कि उनकी बहन अपनी भाभियों की प्रताड़ना से तंग आकर समाधि ले चुकी है। भाइयों ने अपनी बहन की याद में टौणीदेवी में एक पूजन स्थल बना दिया और यही स्थल आज विशाल मंदिर में तबदील हो गया है। 

हर वर्ष मेले का आयोजन– माता की याद में यहां हर वर्ष जून जुलाई में मेले का आयोजन होता है। माता टौणीदेवी को सुनाई नहीं देता था। आज भी माता की पूजा-अर्चना से पहले दो पत्थरों को आपस में टकराया जाता है। आस्था है कि कानों से न सुनने वाली देवी को पत्थर की आवाज से अपनी ओर ध्यान करवाया जाता है

क्षेत्र के लोग अपनी कुलदेवी को फसल का चढ़ावा चढ़ाते हैं। माता के दर पर सच्चे मन से की गई फरियाद हमेशा पूर्ण होती है। इसी आस्था के चलते मंदिर में हर दिन श्रद्धालु चले रहते हैं। आज यहां पर भोले नाथ, हनुमान जी, शनिदेव महाराज, बाबा बालकनाथ जी, श्री साईं की मूर्ति स्थापित है।

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